Organic Farming | जैविक खेती क्या है? पूरी जानकारी हिंदी में

जैविक खेती क्या है? पूरी जानकारी हिंदी में


किसानों और खेती में रुचि रखने वालों के लिए, जैविक खेती आज के समय में एक महत्वपूर्ण विकल्प बन गई है। जैविक खेती वह पद्धति है जिसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बिना प्राकृतिक तरीकों से फसलें उगाई जाती हैं। इस लेख में हम जैविक खेती के फायदों, इसकी विभिन्न विधियों और जैविक प्रमाणीकरण की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे। साथ ही, सरकारी योजनाओं और सफल किसानों की कहानियों से आपको प्रेरणा मिलेगी कि कैसे आप भी जैविक खेती अपना सकते हैं।


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जैविक खेती का परिचय


जैविक खेती की परिभाषा

जैविक खेती एक ऐसी प्राकृतिक खेती पद्धति है जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और जीन संशोधित बीजों का उपयोग नहीं किया जाता। इसमें फसल चक्र, हरी खाद, कम्पोस्ट, जैविक खाद और जैविक कीट नियंत्रण जैसे प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल करके मिट्टी की उर्वरता बनाए रखी जाती है। सरल शब्दों में कहें तो जैविक खेती वह है जिसमें प्रकृति के साथ काम किया जाता है, उसके खिलाफ नहीं।

पारंपरिक खेती से अंतर


पारंपरिक और जैविक खेती में कई मूलभूत अंतर हैं:

पारंपरिक खेती

जैविक खेती

रासायनिक उर्वरकों का उपयोग

जैविक खाद और कम्पोस्ट का उपयोग

सिंथेटिक कीटनाशकों का प्रयोग

प्राकृतिक कीट नियंत्रण विधियां

जीएमओ बीजों का इस्तेमाल

केवल प्राकृतिक बीजों का प्रयोग

मिट्टी का तेजी से क्षरण

मिट्टी की उर्वरता में सुधार

पानी और ऊर्जा का अधिक उपयोग

संसाधनों का टिकाऊ उपयोग



जैविक खेती के मूलभूत सिद्धांत


जैविक खेती चार मुख्य सिद्धांतों पर आधारित है:
1. स्वास्थ्य का सिद्धांत: मिट्टी, पौधों, जानवरों और मनुष्यों का स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़ा है।
2. पारिस्थितिकी का सिद्धांत: खेती जीवित पारिस्थितिक तंत्रों पर आधारित होनी चाहिए।
3. निष्पक्षता का सिद्धांत: प्रकृति और जीवों के प्रति सम्मान और न्याय।
4. देखभाल का सिद्धांत: वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए पर्यावरण की सुरक्षा।

इन सिद्धांतों का पालन करके किसान न सिर्फ अच्छी फसल उगाते हैं बल्कि प्रकृति के संतुलन को भी बनाए रखते हैं।

भारत में जैविक खेती का इतिहास


भारत में जैविक खेती की जड़ें हजारों साल पुरानी हैं। हमारे पूर्वजों ने वेदों और अन्य प्राचीन ग्रंथों में खेती के प्राकृतिक तरीकों का उल्लेख किया है। गोबर, गोमूत्र और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग करके खेती करना भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है।

1960 के दशक में हरित क्रांति के साथ रासायनिक खेती शुरू हुई, लेकिन इसके नुकसान देखकर 1990 के दशक से जैविक खेती की ओर वापसी शुरू हुई। आज सिक्किम जैसे राज्य पूरी तरह जैविक बन चुके हैं, और सरकार भी 'परम्परागत कृषि विकास योजना' जैसी योजनाओं के माध्यम से जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है।

जैविक खेती के फायदे


स्वास्थ्य लाभ

जैविक खेती से उगाए गए खाद्य पदार्थों में रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों का उपयोग नहीं होता। इसका मतलब है कि आप जो खाते हैं, वह ज़हरीले रसायनों से मुक्त होता है। ये खाद्य पदार्थ न सिर्फ स्वादिष्ट होते हैं, बल्कि पोषक तत्वों से भी भरपूर होते हैं।
जैविक खाना खाने से कैंसर, अल्जाइमर और हार्ट अटैक जैसी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। बच्चों के लिए तो ये और भी ज़रूरी है, क्योंकि उनका शरीर रसायनों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होता है।

पर्यावरण संरक्षण

जैविक खेती पर्यावरण की दोस्त है। इसमें रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल न होने से मिट्टी, पानी और हवा में प्रदूषण नहीं फैलता। पारंपरिक खेती में जो केमिकल इस्तेमाल होते हैं, वे बारिश के पानी के साथ बह कर नदियों और तालाबों में पहुंचते हैं और जलीय जीवों को नुकसान पहुंचाते हैं।
जैविक खेती कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में भी मदद करती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से निपटने में सहायता मिलती है।

मिट्टी की उर्वरता में सुधार

जैविक खेती का सबसे बड़ा फायदा है मिट्टी की सेहत का सुधार। जब आप जैविक खाद और फसल चक्र का इस्तेमाल करते हैं, तो मिट्टी में जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है। ये जीवाणु मिट्टी को ज़िंदा और उपजाऊ बनाए रखते हैं।
रासायनिक खेती के विपरीत, जैविक खेती में मिट्टी की उर्वरता हर साल बढ़ती जाती है, न कि कम होती है। इससे लंबे समय तक स्थिर उत्पादन मिलता है।

आर्थिक लाभ

हालांकि शुरुआत में जैविक खेती में लागत ज्यादा हो सकती है, लेकिन लंबे समय में यह किसानों के लिए फायदेमंद साबित होती है। जैविक उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है और उनकी कीमत भी अधिक होती है।
किसान महंगे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भर नहीं रहते, जिससे उनकी लागत कम होती है। साथ ही, वे अपनी फसलों के लिए बेहतर दाम पा सकते हैं।

जैव विविधता को बढ़ावा

जैविक खेती जैव विविधता का समर्थन करती है। इसमें अलग-अलग प्रकार के पौधों और फसलों को उगाया जाता है, जिससे कीड़े, पक्षी और अन्य जीव आकर्षित होते हैं। इससे प्राकृतिक संतुलन बना रहता है और कीट नियंत्रण में मदद मिलती है।
फसल चक्र और मिश्रित खेती से खेत में विभिन्न प्रकार के जीवों का वास स्थान बनता है, जो पर्यावरण के लिए अच्छा है।

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जैविक खेती की विधियां


जैविक खाद तैयार करना

आज की दुनिया में जैविक खेती का महत्व बढ़ता जा रहा है। और इसकी सबसे महत्वपूर्ण विधि है जैविक खाद का निर्माण। आप घर पर ही पौधों के लिए खास खाद बना सकते हैं। बस रसोई से बचा हुआ खाना, सूखे पत्ते और गाय का गोबर जैसी चीज़ें ज़मीन में एक गड्ढे में डाल दें। लगभग 3 से 4 महीने इंतज़ार करें, और यह स्वस्थ मिट्टी में बदल जाएगी। यह मिट्टी पौधों को बड़ा और बेहतर बढ़ने में मदद करती है और मिट्टी को मज़बूत बनाती है।
वर्मी कम्पोस्ट भी एक बेहतरीन विकल्प है। इसमें केंचुए कचरे को खाद में बदलते हैं। यह खाद न सिर्फ पोषक तत्वों से भरपूर होती है, बल्कि इससे मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की संख्या भी बढ़ती है।

जीवामृत भारत की प्राचीन पद्धति है। इसे बनाने के लिए गाय का गोबर, गौमूत्र, गुड़, बेसन और जंगली पेड़ों की मिट्टी को पानी में मिलाकर 48 घंटे तक किण्वित करें। यह तरल खाद फसलों के लिए अमृत के समान काम करती है।

जैविक कीट नियंत्रण

रासायनिक कीटनाशकों के बिना भी आप अपनी फसल को कीड़ों से बचा सकते हैं। नीम का तेल, लहसुन और मिर्च का स्प्रे घर पर ही बनाकर छिड़क सकते हैं। ये प्राकृतिक स्प्रे कीटों को दूर रखते हैं और फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाते।
मित्र कीट जैसे लेडीबग, मकड़ी और तितलियों को अपने खेत में आमंत्रित करें। ये हानिकारक कीड़ों को खाकर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं।
फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करके भी कीटों को नियंत्रित किया जा सकता है। ये ट्रैप कीटों को आकर्षित करके फंसा लेते हैं, जिससे वे फसलों को नुकसान नहीं पहुंचा पाते।

फसल चक्र व्यवस्था

एक ही जगह पर बार-बार एक ही फसल उगाने से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और कीट-रोगों का प्रकोप बढ़ता है। इसलिए फसल चक्र अपनाना जरूरी है।

दलहनी फसलों (जैसे मूंग, अरहर, चना) को फसल चक्र में शामिल करें। ये नाइट्रोजन स्थिरीकरण द्वारा मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं। पहले सीजन में अनाज, दूसरे में दलहन और तीसरे में सब्जियां उगाकर आप मिट्टी की उर्वरता बनाए रख सकते हैं।
गहरी जड़ वाली फसलों के बाद उथली जड़ वाली फसलें लगाएं। इससे मिट्टी के अलग-अलग स्तरों से पोषक तत्वों का उपयोग होता है।

मिश्रित खेती

मिश्रित खेती यानी एक ही खेत में एक साथ कई फसलों को उगाना। जैसे मक्का के साथ लोबिया या अरहर। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और कीटों का प्राकृतिक नियंत्रण होता है।
कंपैनियन प्लांटिंग भी मिश्रित खेती का ही एक रूप है। कुछ पौधे एक-दूसरे के विकास में सहायक होते हैं, जैसे प्याज और गाजर एक साथ लगाने से कीटों का प्रकोप कम होता है।

ट्री-क्रॉप सिस्टम में पेड़ों के बीच फसलें उगाई जाती हैं। पेड़ छाया प्रदान करते हैं और मिट्टी की नमी बनाए रखते हैं, जबकि फसलें किसान को नियमित आय देती हैं।

जैविक प्रमाणीकरण


माणीकरण की प्रक्रिया

जैविक प्रमाणीकरण एक लंबी प्रक्रिया है, पर चिंता मत करिए - इसे समझना उतना मुश्किल नहीं है। सबसे पहले, किसान को एक प्रमाणित संस्था में आवेदन जमा करना होता है। फिर खेत का निरीक्षण होता है जहां अधिकारी मिट्टी की जांच करते हैं और पिछले तीन साल के खेती के रिकॉर्ड देखते हैं।

यह रूपांतरण काल कम से कम 3 साल का होता है। इस दौरान आपको रसायनों का उपयोग बंद करके जैविक तरीकों को अपनाना होगा। हर साल निरीक्षण होगा और आपको अपने खेत के हर काम का विस्तृत रिकॉर्ड रखना होगा।

सारे मानदंड पूरे होने पर ही प्रमाणपत्र मिलता है, जो हर साल नवीकरण करवाना पड़ता है। याद रखें - यह प्रक्रिया कागजी कार्रवाई से भरी है, इसलिए सारे दस्तावेज़ संभालकर रखें!

प्रमाणीकरण के लिए आवश्यक मानदंड

जैविक प्रमाणीकरण पाने के लिए कुछ सख्त नियमों का पालन करना जरूरी है:

  • रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का पूर्ण त्याग
  • जीएम (आनुवंशिक रूप से संशोधित) बीजों का उपयोग वर्जित
  • फसल चक्र और मिश्रित खेती अपनाना
  •  मिट्टी को स्वस्थ रखने में मदद के लिए खाद, कम्पोस्ट और उगाए गए पौधों जैसी प्राकृतिक चीजों का उपयोग करना।
  • खेत की अखंडता बनाए रखना (पड़ोसी खेतों से रसायनों का प्रवेश रोकना)
  • पशुओं के लिए मानवीय परिस्थितियां और जैविक चारा
  • पूर्ण पारदर्शिता और रिकॉर्ड रखना
  • जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण

प्रमुख प्रमाणीकरण संस्थाएं


भारत में कई संस्थाएं जैविक प्रमाणन देती हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  • जैविक उत्पादन राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPOP) - भारत सरकार का आधिकारिक प्रमाणीकरण कार्यक्रम, जो विदेशों में भी मान्यता प्राप्त है।
  • भारतीय जैविक प्रमाणन एजेंसी (INDOCERT) - केरल में स्थित, अंतरराष्ट्रीय मानकों पर काम करती है।
  • पीजीएस इंडिया (PGS) - छोटे किसानों के लिए सहभागी गारंटी प्रणाली, जो स्थानीय बाजार के लिए सस्ता विकल्प है।
  • एपेडा (APEDA) - कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण, जो निर्यात के लिए प्रमाणीकरण देता है।

इन संस्थाओं से प्रमाणीकरण लेकर आप अपने उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेच सकते हैं, जिससे अधिक मूल्य मिलेगा।


जैविक खेती के लिए आवश्यक संसाधन


जैविक बीज

जैविक खेती की शुरुआत अच्छे बीजों से होती है। ये बीज रासायनिक मुक्त होते हैं और प्राकृतिक तरीके से विकसित किए जाते हैं।
आपने कभी सोचा है कि आपके दादा-दादी के समय में इतनी बीमारियां क्यों नहीं थीं? क्योंकि तब बीज असली थे, कोई हेरफेर नहीं!
जैविक बीज कैसे चुनें:
  • देशी किस्में चुनें जो आपके क्षेत्र के अनुकूल हों
  • किसानों से सीधे बीज खरीदें या बीज बचाने वाले समूहों से संपर्क करें
  • GMO और हाइब्रिड बीजों से बचें
अपने बीज खुद बचाएं! यह न सिर्फ पैसे बचाएगा बल्कि आपके बीज स्थानीय जलवायु के लिए अनुकूलित हो जाएंगे।

जैविक खाद

रासायनिक खादों ने मिट्टी को जिंदा से मुर्दा बना दिया है। जैविक खाद मिट्टी में जान डालती है।
प्रमुख जैविक खाद विकल्प:
  • कंपोस्ट: रसोई और बगीचे के कचरे से बनाएं
  • गोबर की खाद: गाय के गोबर से तैयार की जाती है
  • जीवामृत: गोबर, गौमूत्र, गुड़ और बेसन का मिश्रण
  • वर्मीकम्पोस्ट: केंचुओं द्वारा तैयार खाद

जीवामृत बनाने की विधि:

  1. 10 किलो गोबर + 5-10 लीटर गौमूत्र
  2. 2 किलो गुड़ + 2 किलो बेसन
  3. एक हैंडफुल मिट्टी
  4. 200 लीटर पानी में मिलाकर 48 घंटे फरमेंट करें

प्राकृतिक कीटनाशक

रासायनिक कीटनाशक न सिर्फ हानिकारक कीटों को मारते हैं, बल्कि मित्र कीट, परागणकारी और हमारे स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाते हैं।
घरेलु कीटनाशक जो आप आज ही बना सकते हैं:

  • नीम स्प्रे: 500 ग्राम नीम पत्ती + 10 लीटर पानी (24 घंटे भिगोएं)
  • लहसुन स्प्रे: 100 ग्राम लहसुन + थोड़ा तेल + 1 लीटर पानी
  • मिर्च-प्याज मिश्रण: 3-4 मिर्च + 1 प्याज + 1 लीटर पानी
याद रखें, जैविक खेती में कीट प्रबंधन का मतलब सभी कीटों को मारना नहीं, बल्कि उनकी संख्या को नियंत्रित रखना है। मित्र कीटों को बढ़ावा देने के लिए अपने खेत में विविधता लाएं और फूलों वाले पौधे लगाएं।


जैविक खेती में चुनौतियां और समाधान


उत्पादन में कमी


जैविक खेती अपनाने पर शुरुआत में उत्पादन में कमी आना एक बड़ी चुनौती है। जब किसान फसल उगाने के लिए रसायनों का इस्तेमाल छोड़कर प्राकृतिक तरीकों (जिसे जैविक खेती कहा जाता है) का इस्तेमाल करने लगते हैं, तो हो सकता है कि उन्हें शुरुआत में उतनी फसल न मिले—शायद पहले के मुकाबले 20 से 30 कम—शुरुआती कुछ सालों में। इसी वजह से, कुछ किसान बदलाव नहीं करना चाहते। इसके अलावा, अगर वे लंबे समय से रसायनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो ज़मीन थक जाती है और स्वस्थ नहीं रहती। मिट्टी को फिर से स्वस्थ होने में कुछ समय लगता है।

प्रारंभिक लागत


जैविक खेती शुरू करने में पैसों की जरूरत होती है। जैविक प्रमाणीकरण की फीस, जैविक बीज खरीदना, वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगाना, और जैविक कीटनाशक बनाने के लिए सामग्री - ये सब शुरुआती खर्च बढ़ा देते हैं। छोटे किसानों के लिए यह मुश्किल हो जाता है, खासकर जब तत्काल फायदा नहीं दिखता।

बाजार से जुड़ी चुनौतियां


जैविक उत्पादों को बेचना भी आसान नहीं। अक्सर ग्रामीण इलाकों में जैविक उत्पादों का अलग बाजार नहीं होता। शहरों में जैविक उत्पादों की मांग तो है, लेकिन छोटे किसानों की वहां तक पहुंच नहीं होती। बिचौलिए कई बार उचित दाम नहीं देते और कई उपभोक्ता जैविक उत्पादों की ऊंची कीमत चुकाने को तैयार नहीं होते।

तकनीकी ज्ञान की कमी


जैविक खेती के लिए गहरे तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है। फसल चक्र, जैविक खाद, प्राकृतिक कीट नियंत्रण, जैव-उर्वरक - इन सबके बारे में जानकारी चाहिए। ज्यादातर किसानों को पूरी जानकारी नहीं होती और सरकारी प्रशिक्षण की कमी के चलते वे जैविक खेती के तरीके ठीक से नहीं अपना पाते।

समाधान के उपाय


इन चुनौतियों के कुछ कारगर समाधान हैं:

  • किसान समूह बनाएं - मिलकर जैविक प्रमाणीकरण कराएं और बड़े बाजारों तक पहुंचें
  • मिश्रित खेती करें - जैविक खेती में बदलाव के दौरान कुछ फसलों को ही जैविक तरीके से उगाएं
  •  सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं - कई राज्य सरकारें जैविक खेती के लिए सब्सिडी देती हैं
  •  प्रशिक्षण कार्यक्रम - जैविक किसानों के नेटवर्क से जुड़ें और वर्कशॉप में भाग लें
  • डिजिटल मार्केटिंग - सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर अपने उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाएं

जैविक खेती अपनाने के पहले 3 साल सबसे मुश्किल होते हैं, लेकिन धैर्य और सही तकनीक से आगे चलकर इसके फायदे मिलते हैं।



सफल जैविक किसानों की कहानियां

उत्तर भारत के सफल किसान


हरियाणा के गुरमीत सिंह ने 10 एकड़ जमीन पर जैविक खेती शुरू की। शुरुआत में लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। "पागल हो गया है, रासायनिक खाद छोड़कर गोबर से खेती करेगा!" पर गुरमीत ने हार नहीं मानी।

तीन साल बाद, उसका खेत वाकई बहुत अच्छा हो गया। उसने बिना किसी रसायन का इस्तेमाल किए, स्वादिष्ट गेहूँ, सरसों और सब्ज़ियाँ खुद उगाईं। उसका खाना खास और सेहतमंद था, इसलिए शहर के बहुत से लोग उसे खरीदना चाहते थे।अब, वह अपने फार्म से हर साल 40 लाख रुपये कमाते हैं।

उत्तराखंड के रमेश रावत ने जैविक मसालों की खेती से धूम मचा दी है। उनकी हल्दी और अदरक जापान तक निर्यात होती है। "मेरे दादा कहते थे - मिट्टी को जीवित रखो, वो तुम्हें जिंदा रखेगी।"

दक्षिण भारत के सफल किसान


केरल की लक्ष्मी नायर ने 5 एकड़ में जैविक कॉफी और मसालों का चमत्कार दिखाया है। "रासायनिक खेती हमारे पहाड़ों को मार रही थी," वे बताती हैं। जैविक प्रमाणीकरण के बाद उनकी कॉफी यूरोप में दोगुने दाम पर बिकती है।

तमिलनाडु के सुब्रमण्यम ने अपने 8 एकड़ में जैविक धान और केले की मिश्रित खेती से अनोखा मॉडल विकसित किया। "जैविक खेती सिर्फ रसायन हटाना नहीं है, ये प्रकृति के साथ सहयोग है।" उनके खेत आज शिक्षा केंद्र बन गए हैं जहां हर महीने सैकड़ों किसान सीखने आते हैं।

जैविक खेती से करोड़पति बने किसान


महाराष्ट्र के राजेश पाटिल के पास 300 एकड़ का एक बड़ा फार्म है, जहाँ वे बिना किसी रसायन के प्राकृतिक रूप से भोजन उगाते हैं। वे पहले इंजीनियर की नौकरी करते थे, लेकिन उन्होंने नौकरी छोड़कर खेती करने का फैसला किया। कुछ लोगों को लगा कि वे पागल हो गए हैं। अब उनकी कंपनी 'नेचर्स बाउंटी' खूब सारा ऑर्गेनिक भोजन बेचती है और हर साल लगभग 5 करोड़ रुपये कमाती है।

पंजाब के अमरजीत सिंह ने 20 एकड़ से शुरुआत की, आज 200 किसानों के नेटवर्क से जैविक उत्पादों की सप्लाई चेन बनाई है। "अपनी मिट्टी, अपना पानी और अपनी सेहत बचाने का यही एक रास्ता है।" उनकी कंपनी 'ग्रीन हार्वेस्ट' पिछले साल 12 करोड़ की बिक्री कर चुकी है।



जैविक खेती के लिए सरकारी योजनाएं



केंद्र सरकार की योजनाएं


भारत में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने कई महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की हैं। परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY) इनमें सबसे प्रमुख है, जिसके तहत किसानों को क्लस्टर आधारित प्रशिक्षण और जैविक प्रमाणीकरण मिलता है। हर क्लस्टर में 50 एकड़ भूमि शामिल होती है और किसानों को तीन साल तक सहायता दी जाती है।

मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्ट रीजन (MOVCDNER) भी एक महत्वपूर्ण योजना है, जो पूर्वोत्तर राज्यों में जैविक खेती को बढ़ावा देती है। इसके अलावा, राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र (NCOF) और राष्ट्रीय स्थायी कृषि मिशन जैसी पहल भी चल रही हैं।

राज्य सरकारों की पहल


सिक्किम पूरी तरह से जैविक राज्य बनने वाला भारत का पहला राज्य है। यहां 2003 से ही जैविक मिशन शुरू किया गया था। उत्तराखंड में भी जैविक खेती बोर्ड की स्थापना की गई है जो किसानों को जैविक तरीकों से खेती करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

मध्य प्रदेश ने 'जैविक खेती नीति' लागू की है जिसमें किसानों को विशेष प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच प्रदान की जाती है। महाराष्ट्र में 'जैविक खेती अभियान' चलाया जा रहा है, जिसमें किसानों को जैविक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है।

सब्सिडी और प्रोत्साहन


जैविक खेती अपनाने वाले किसानों को कई तरह की सब्सिडी और प्रोत्साहन मिलते हैं:

  • जैविक इनपुट खरीद पर 50% तक की सब्सिडी
  • प्रमाणीकरण शुल्क पर 75% तक की छूट
  • जैविक बीज बैंक स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता
  • बाजार में स्वस्थ, प्राकृतिक खाद्य पदार्थ बेचने के लिए एक विशेष स्थान।

कई राज्यों में जैविक उत्पादों की बिक्री के लिए विशेष हाट-बाजार भी स्थापित किए गए हैं। इसके अलावा, कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से नि:शुल्क तकनीकी जानकारी और प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता है।


FAQS:- 


  • जैविक खेती क्या है?

उत्तर: जैविक खेती वह कृषि प्रणाली है जिसमें रासायनिक खाद, कीटनाशक या संश्लेषित उत्पादों का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों जैसे खाद, गोबर, वर्मी कम्पोस्ट, नीम आदि से खेती की जाती है।

  • जैविक खेती का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर: इसका उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा करते हुए स्वस्थ, पोषक और रसायन-मुक्त खाद्य उत्पाद उपलब्ध कराना है।

  • क्या जैविक खेती से उत्पादन कम होता है?

उत्तर: आरंभ में उत्पादन कम हो सकता है, लेकिन मिट्टी की गुणवत्ता सुधरने पर दीर्घकाल में अच्छा उत्पादन संभव है।

  • क्या जैविक उत्पाद अधिक महंगे होते हैं?

उत्तर: हाँ, जैविक उत्पादों की कीमत सामान्य उत्पादों से अधिक होती है क्योंकि उनकी उत्पादन प्रक्रिया प्राकृतिक और धीमी होती है।

  • भारत में कौन-कौन से राज्य जैविक खेती में अग्रणी हैं?

उत्तर: सिक्किम (पूरी तरह जैविक राज्य), उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, केरल, ओडिशा आदि।

 Conclusions 


जैविक खेती एक ऐसी पद्धति है जो पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता की रक्षा करते हुए स्थायी कृषि को बढ़ावा देती है। इसके फायदे अनगिनत हैं - मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर होता है, उत्पादित भोजन पोषक तत्वों से भरपूर होता है, और किसानों को दीर्घकालिक आर्थिक लाभ मिलता है। विभिन्न विधियों और प्रमाणीकरण प्रक्रियाओं के माध्यम से, भारत में जैविक खेती का विस्तार हो रहा है।












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